उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक अहम निर्णय सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई पुरुष अपनी पहली वैध शादी को छिपाकर दूसरी महिला से विवाह करता है और इस आधार पर यौन संबंध बनाता है, तो इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत बलात्कार माना जाएगा। न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने सार्थक वर्मा की धारा 482 सीआरपीसी के तहत दायर याचिका खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी। मामला देहरादून निवासी एक महिला से जुड़ा है, जिसने सितम्बर 2021 में एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप था कि अभियुक्त ने अपनी पहली शादी छुपाकर अगस्त 2020 में उससे विवाह किया और बाद में दहेज मांगने, प्रताड़ित करने व यौन शोषण जैसे कृत्य किए। जांच के दौरान पहले कई धाराएँ हटाई गईं, लेकिन नए जांच अधिकारी ने गंभीर धाराएँ- धारा 375(4), 376, 493, 495 और 496 आईपीसी जोड़ दीं। अभियुक्त ने अदालत में तर्क दिया कि पीड़िता पहले से उसकी शादी के बारे में जानती थी और पुलिस ने पक्षपातपूर्ण जांच की। वहीं राज्य सरकार और पीड़िता ने कहा कि अभियुक्त ने जानबूझकर अपनी पहली शादी छिपाई और महिला को धोखे में रखकर विवाह व संबंध बनाए। अदालत ने माना कि जब कोई महिला यह विश्वास करके यौन संबंध बनाती है कि वह अभियुक्त की विधिवत पत्नी है, लेकिन वास्तविकता में वह पहले से विवाहित हो, तो उसकी सहमति को वास्तविक नहीं माना जाएगा। यह “भ्रमित सहमति” कहलाएगी और इसे बलात्कार की परिभाषा के अंतर्गत रखा जाएगा।हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि मामले में गंभीर अपराधों के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। इसी आधार पर सार्थक वर्मा की याचिका निरस्त कर दी गई और पूर्व में दिया गया अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिया गया।
