अल्मोड़ा/कुमाऊं | विशेष संवाददाता
मकर संक्रांति के पावन अवसर पर कुमाऊं अंचल में पारंपरिक घुघुतिया (उत्तरायणी) पर्व पूरे श्रद्धा, उल्लास और लोक-संस्कृति की रंगत के साथ मनाया गया। गांव-शहरों से लेकर पहाड़ी बस्तियों तक सुबह होते ही बच्चों की आवाज़ों से वातावरण गूंज उठा —“काले कौवा काले, घुघुति माला खाले।”मकर संक्रांति के साथ सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण की शुरुआत होती है,
जिसे ऋतु परिवर्तन, नई फसल और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इसी पावन अवसर पर कुमाऊँ में सदियों से घुघुतिया पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही है।इस पर्व की पहचान है पारंपरिक मीठा पकवान ‘घुघुत’, जो गेहूं के आटे, गुड़ और शुद्ध घी से बनाया जाता है।
घुघुत को चिड़िया, ढाल, तलवार और मानव आकृतियों में ढालकर बच्चों के गले में माला की तरह पहनाया जाता है।सुबह बच्चे छतों और आंगनों में जाकर कौवों को बुलाते हैं और लोकगीतों के माध्यम से उन्हें घुघुत खिलाते हैं। मान्यता है कि कौवे पितरों के दूत होते हैं और उन्हें भोजन कराने से पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।घुघुतिया पर्व से जुड़ी लोककथा भी कुमाऊँ में अत्यंत लोकप्रिय है, जिसमें एक राजकुमार और उसकी बहन की कथा के माध्यम से इस परंपरा की शुरुआत मानी जाती है।आज भी यह पर्व कुमाऊँ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, प्रकृति और लोक आस्था के गहरे संबंधों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है।घुघुतिया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोक-स्मृति और संस्कृति का उत्सव है।
